1 मजाक बना महाविनाश का कारण! कैसे श्रीकृष्ण के पुत्र ने मिटा दिया यदुवंश, जानिए पौराणि कथा

1 मजाक बना महाविनाश का कारण! कैसे श्रीकृष्ण के पुत्र ने मिटा दिया यदुवंश, जानिए पौराणि कथा

Krishna Death Story: धर्म, नीति और लीला की कहानियों में श्रीकृष्ण का जीवन जितना अद्भुत है, उनका देह त्याग उतना ही रहस्यमय और मार्मिक माना जाता है. यह कथा केवल एक अवतार के पृथ्वी से प्रस्थान की नहीं, बल्कि उस अनोखे मोड़ की भी है जहां ईश्वरीय इच्छा और मानवीय कर्म एक साथ दिखाई देते हैं. पुराणों में वर्णित प्रसंग के अनुसार, यदुवंश का अंत किसी बाहरी शत्रु ने नहीं, बल्कि एक साधारण-सा मजाक और उससे उपजा शाप बना. यह घटना दिखाती है कि अहंकार, उपहास और अधर्म का परिणाम कितना दूरगामी हो सकता है. श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने कुल के विनाश की भूमिका रची-क्योंकि उनके अनुसार पृथ्वी का भार तभी पूर्ण रूप से कम होता. यह कथा आज भी धर्मग्रंथों में चेतावनी और दर्शन, दोनों रूप में सुनाई जाती है.

मजाक जिसने बदल दी नियति
यदुवंश के युवराज सांब, जो श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र थे, अपनी शरारती प्रकृति के लिए जाने जाते थे. एक दिन उन्होंने मित्रों के साथ मिलकर एक ऐसा मजाक किया जो इतिहास बन गया. उन्होंने स्त्री का वेश धारण किया और ऋषि विश्वामित्र, नारद सहित कई मुनियों के पास जाकर पूछा-“बताइए, इसके गर्भ से क्या जन्म होगा?” ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह छल तुरंत पहचान लिया. उपहास और अपमान से क्रोधित होकर उन्होंने शाप दिया-“इसके गर्भ से लोहे का मूसल उत्पन्न होगा, जो पूरे यदुवंश के विनाश का कारण बनेगा.” उस क्षण को शायद किसी ने गंभीरता से नहीं लिया, पर वही मजाक आने वाले समय की त्रासदी बन गया.

शाप का फल: सांब के गर्भ से मूसल
समय बीतने पर शाप सत्य हुआ. सांब के पेट से वास्तव में लोहे का एक मूसल निकला. राजा उग्रसेन भयभीत हो उठे. उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि उस मूसल को पीसकर चूर्ण बना दिया जाए और समुद्र में फेंक दिया जाए, ताकि शाप का असर खत्म हो सके.

समुद्र किनारे उगे सरकंडे
जहां मूसल का चूर्ण फेंका गया, वहां अजीब तरह के सरकंडे उग आए-कठोर और लोहे जैसे. एक छोटा-सा टुकड़ा बच गया था, जिसे एक मछली निगल गई. बाद में वह टुकड़ा एक शिकारी जरा के हाथ लगा, जिसने उससे बाण का फल बना लिया.

यहीं से नियति ने अपना अंतिम ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया था.

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द्वारका में दिखने लगे अशुभ संकेत
कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने द्वारका में अनिष्ट के संकेत महसूस करने शुरू कर दिए थे. आकाशीय घटनाएं, विचित्र स्वप्न और वातावरण की बेचैनी-सब कुछ आने वाले अंत की ओर संकेत कर रहा था. देवताओं ने भी संदेश भेजा कि अब उनका अवतार कार्य पूर्ण हो चुका है और उन्हें स्वधाम लौटना चाहिए. श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि यदुवंश का अंत हुए बिना पृथ्वी का भार पूर्णतः हल्का नहीं होगा. उन्होंने संकेत दिया कि सात रातों में यह कार्य पूरा होगा और फिर वे द्वारका को समुद्र को लौटाकर प्रस्थान करेंगे.

प्रभास में यदुवंश का आत्मविनाश
उत्सव से उत्पन्न हुआ विवाद
प्रभास क्षेत्र में यदुवंशी एकत्र हुए. उत्सव, मदिरा और अहंकार-तीनों ने मिलकर वातावरण को विषाक्त बना दिया. छोटी-सी कहासुनी झगड़े में बदल गई.

सरकंडों से बना शस्त्र
जब शस्त्र समाप्त हो गए, तो वहीं उगे सरकंडे हाथों में आ गए. वे साधारण पौधे नहीं थे-मूसल के चूर्ण से जन्मे लोहे जैसे कठोर. यदुवंशी एक-दूसरे पर उन्हीं से प्रहार करने लगे. श्रीकृष्ण ने रोकने का प्रयास किया, पर कोई नहीं माना. अंततः उन्होंने भी मुट्ठीभर सरकंडे उठाए, जो तत्काल लोहे के मूसल समान बन गए. उसी से उन्होंने उग्र और अधर्मी यदुवंशियों का अंत कर दिया. कुछ ही समय में समूचा यदुवंश समाप्त हो गया-सिवाय श्रीकृष्ण और उनके सारथी दारुक के.

श्रीकृष्ण का देह त्याग: जरा का बाण
यदुवंश के अंत के बाद श्रीकृष्ण प्रभास के वन में एक पीपल वृक्ष के नीचे योगनिद्रा में लेट गए. उनका पैर दूसरे पैर पर रखा था, और अंगूठा दूर से मृग की आंख जैसा दिखता था. उसी समय शिकारी जरा वहां पहुंचा. उसने उसी लोहे के टुकड़े से बने बाण को धनुष पर चढ़ाया और दूर से निशाना साधा. बाण सीधा श्रीकृष्ण के अंगूठे में लगा. पास आने पर जरा ने देखा कि यह कोई मृग नहीं, बल्कि दिव्य पुरुष हैं. वह भय और पश्चाताप से उनके चरणों में गिर पड़ा. श्रीकृष्ण ने उसे सांत्वना दी-“यह सब मेरी इच्छा से हुआ है, तुम दोषी नहीं.” कथा कहती है कि उसी क्षण एक दिव्य विमान आया और जरा को मुक्ति मिली. इसके बाद श्रीकृष्ण ने शांत भाव से अपनी देह का त्याग किया और स्वधाम लौट गए.

कथा का संदेश: लीला और नियति का संगम
श्रीकृष्ण का देह त्याग साधारण मृत्यु नहीं माना जाता, बल्कि अवतार के पूर्ण होने की लीला है. इस कथा में एक गहरा संदेश छिपा है-अहंकार और उपहास का परिणाम विनाश हो सकता है, चाहे वह देववंश ही क्यों न हो. यदुवंश का अंत किसी बाहरी युद्ध से नहीं, भीतर के दोषों से हुआ. और अंततः वही मूसल, जो मजाक से जन्मा था, नियति का साधन बना.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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