Chandra Nadi Upay: हर वक्त लगता है 'कहीं कुछ बुरा न हो जाए'? शिवभक्ति से जुड़ा ‘चंद्र नाड़ी’ उपाय क्यों हो रहा वायरल! क्या सच में है असरदार
Chandra Nadi Upay: घर से बाहर निकलते वक्त अचानक मन में डर-“कहीं कुछ गलत न हो जाए”… कई लोगों के लिए ये कोई नई बात नहीं. आज के दौर में चिंता, आशंका और बिना वजह के डर जैसे विचार आम हो गए हैं. खासकर माता-पिता, गृहिणियां और बुजुर्ग-छोटी-सी बात को भी बड़ा खतरा मान लेते हैं. इसी मानसिक बेचैनी के बीच धार्मिक मंचों और सोशल मीडिया पर एक खास उपाय तेजी से चर्चा में है-‘चंद्र नाड़ी सक्रिय करने’ की विधि. कथावाचकों और आध्यात्मिक गुरुओं के अनुसार, यह शिवभक्ति से जुड़ा ऐसा अभ्यास है जो मन की नकारात्मकता को शांत कर सकता है. दावा किया जा रहा है कि हफ्ते में एक बार बेलपत्र और चंदन का प्रयोग तथा कुछ मिनट का खास श्वास अभ्यास करने से मन के डर और गलत आशंकाएं कम हो सकती हैं. सवाल है-क्या सच में लोग इससे राहत महसूस कर रहे हैं?
नकारात्मक विचारों का बढ़ता असर
आज मानसिक तनाव का चेहरा पहले से अलग है. यह सिर्फ बड़े संकटों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की कल्पनाओं से पैदा होता है. कोई मां बच्चे के स्कूल जाने पर बेचैन हो जाती है, किसान बुआई करते समय ही नुकसान की आशंका पाल लेता है, और कई लोग मामूली दर्द को गंभीर बीमारी मान बैठते हैं. मनोवैज्ञानिक इसे “catastrophic thinking” यानी हर स्थिति में बुरा परिणाम सोचने की आदत बताते हैं. धार्मिक प्रवचनों में भी यही बात बार-बार सामने आती है कि लगातार नकारात्मक कल्पनाएं व्यक्ति की मानसिक शांति छीन लेती हैं. हाल में कथाओं और ऑनलाइन सत्संगों में ऐसे उदाहरणों की भरमार देखी जा रही है, जहां लोग खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें बेवजह डर सताता रहता है.
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‘चंद्र नाड़ी’ उपाय क्या है
आध्यात्मिक परंपरा में ‘चंद्र नाड़ी’ को मन और भावनाओं से जुड़ा ऊर्जा मार्ग माना जाता है. कथावाचकों के अनुसार जब यह संतुलित रहती है, तो विचार शांत और सकारात्मक रहते हैं. इसके लिए जो विधि बताई जा रही है, उसमें दो हिस्से हैं-
पहला, बेलपत्र के मध्य भाग पर पीले चंदन का लेप कर शिवलिंग पर अर्पित करना.
दूसरा, आराम से बैठकर दाहिनी नासिका बंद कर बाईं नासिका से 1-2 मिनट श्वास लेना-छोड़ना.
कहा जा रहा है कि यह प्रक्रिया सप्ताह में एक बार करने से चंद्र नाड़ी मजबूत होती है और मन की बेचैनी घटती है.
धार्मिक संदर्भ: शिव और चंद्र का संबंध
धार्मिक कथाओं में वर्णन है कि चंद्रदेव को रोगमुक्त करने के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर धारण किया और मानव मन में निवास का आशीर्वाद दिया. इसी आधार पर माना जाता है कि चंद्र ऊर्जा का संतुलन मानसिक स्थिरता से जुड़ा है. हालांकि आध्यात्मिक अभ्यासों की प्रभावशीलता व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करती है, पर विश्वास रखने वाले इसे मन को केंद्रित करने की प्रक्रिया मानते हैं.
लोग क्यों महसूस कर रहे राहत
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी नियमित अनुष्ठान या ध्यान-जैसी क्रिया का मन पर सकारात्मक असर हो सकता है. जब व्यक्ति एक तय प्रक्रिया को ध्यान से करता है, तो उसका ध्यान नकारात्मक विचारों से हटता है. भोपाल की गृहिणी संगीता (परिवर्तित नाम) कहती हैं, “मुझे हमेशा लगता था कि परिवार के साथ कुछ बुरा हो जाएगा. कुछ हफ्ते से यह अभ्यास कर रही हूं, अब मन थोड़ा शांत लगता है.” इसी तरह इंदौर के एक किसान ने बताया कि बुवाई के समय का डर कम महसूस होता है, क्योंकि वह इसे ‘आत्मविश्वास बढ़ाने’ का तरीका मानते हैं.
आस्था, मनोविज्ञान और श्वास का संगम
ध्यान देने वाली बात यह है कि बताई गई श्वास तकनीक योग की एक जानी-पहचानी विधि-अनुलोम-विलोम के आंशिक रूप-से मिलती है. वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि नियंत्रित श्वास से तनाव हार्मोन घट सकते हैं और मन शांत होता है. यानी चाहे इसे आध्यात्मिक भाषा में चंद्र नाड़ी कहा जाए या वैज्ञानिक भाषा में parasympathetic activation-मूल प्रभाव मन को स्थिर करने का ही है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि नकारात्मक सोच लगातार जीवन को प्रभावित कर रही हो, तो पेशेवर परामर्श भी जरूरी है. धार्मिक या ध्यान अभ्यास सहायक हो सकते हैं, पर उपचार का विकल्प नहीं.
विश्वास से मिलती मानसिक ढाल
नकारात्मक कल्पनाओं से भरे समय में लोग ऐसे उपाय खोज रहे हैं जो मन को सहारा दे सकें. बेलपत्र-चंदन और श्वास अभ्यास का यह संयोजन कई लोगों के लिए प्रतीकात्मक ढाल बन रहा है-एक ऐसा पल, जब वे रुककर अपने डर को छोड़ने की कोशिश करते हैं.
शायद यही कारण है कि यह उपाय धार्मिक कथाओं से निकलकर सोशल मीडिया और घरों तक पहुंच चुका है-क्योंकि आखिरकार हर व्यक्ति को मन की शांति चाहिए.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


