Shivaratri 2026 Jal Abhishek: जल चढ़ाते समय ये 5 गलतियां पड़ सकती हैं भारी, जानें क्या कहती है काशी की परंपरा?
Shivaratri 2026 Jal Abhishek: महाशिवरात्रि आते ही देशभर के मंदिरों में “हर-हर महादेव” की गूंज सुनाई देने लगती है. रात भर जागरण, कतारों में खड़े श्रद्धालु, हाथों में जल का लोटा और मन में एक ही भावना-भोलेनाथ की कृपा मिल जाए, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस जलाभिषेक को हम बड़े विश्वास से करते हैं, उसकी सही विधि क्या है? कई बार जल्दबाज़ी, अधूरी जानकारी या भीड़ के दबाव में हम ऐसी छोटी-छोटी भूलें कर बैठते हैं, जिन पर ध्यान ही नहीं जाता. मान्यता है कि शिव सरल हैं, पर साधना में अनुशासन भी उतना ही जरूरी है. ऐसे में यह समझना अहम हो जाता है कि जल चढ़ाने का सही तरीका क्या है, किस दिशा में बैठना चाहिए, किस पात्र का इस्तेमाल करना चाहिए और किन गलतियों से बचना चाहिए.
जलाभिषेक केवल परंपरा नहीं, एक साधना
महाशिवरात्रि सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का दिन माना जाता है. शिव को संहारक भी कहा गया है और करुणा का सागर भी. यही वजह है कि उनका पूजन बाहरी दिखावे से ज्यादा भीतर की भावना से जुड़ा है. काशी की परंपरा और शिव पुराण में जलाभिषेक को विशेष महत्व दिया गया है. माना जाता है कि सही विधि से किया गया अभिषेक मन को स्थिर करता है और साधक को संयम सिखाता है.
जल चढ़ाते समय होने वाली आम गलतियां
1. किसी भी बर्तन से जल अर्पित करना
अक्सर लोग घर में जो भी बर्तन मिल जाए, उसी से जल चढ़ा देते हैं. खासकर स्टील या प्लास्टिक के बर्तन का इस्तेमाल आम है. परंपरा में तांबे, पीतल या चांदी के पात्र को शुभ माना गया है. इन धातुओं को सात्विक माना जाता है. पुराने पुजारियों का कहना है कि धातु का चयन केवल रीति नहीं, ऊर्जा से जुड़ा विश्वास है.
2. खड़े होकर जल चढ़ाना
भीड़ में लोग जल्दी-जल्दी खड़े-खड़े ही जल अर्पित कर देते हैं. शास्त्रों के अनुसार बैठकर जल चढ़ाना बेहतर माना गया है. बैठने से मन स्थिर होता है और ध्यान भटकता नहीं. यह विनम्रता का संकेत भी है.
3. गलत दिशा में मुख करना
बहुत कम लोग दिशा पर ध्यान देते हैं. मान्यता है कि उत्तर दिशा की ओर मुख करके जल चढ़ाना शुभ होता है. उत्तर दिशा को ज्ञान और समृद्धि की दिशा माना गया है. पूर्व की ओर मुख करके जल अर्पित करना सामान्य भूल मानी जाती है.
4. पूरा जल एक साथ उड़ेल देना
कई श्रद्धालु पूरा लोटा एक बार में ही चढ़ा देते हैं. जबकि परंपरा में धीरे-धीरे, पतली धारा में जल अर्पित करने की बात कही गई है. इसे संयम और धैर्य का प्रतीक माना जाता है. निरंतर धारा मन को एकाग्र करने में मदद करती है.
5. मंत्र के बिना या बिना भाव के अर्पण
मंत्रोच्चारण जलाभिषेक का अहम हिस्सा है. “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हुए जल चढ़ाना शुभ माना जाता है. हालांकि जानकार यह भी कहते हैं कि केवल शब्द नहीं, भावना ज्यादा मायने रखती है. यदि मंत्र सही उच्चारण में न भी हो, लेकिन मन सच्चा हो, तो पूजा अधूरी नहीं मानी जाती.
काशी परंपरा क्या कहती है?
वाराणसी के कुछ पुजारी बताते हैं कि जलाभिषेक के समय साधक को जल्दबाज़ी से बचना चाहिए. कई लोग केवल फोटो खिंचवाने या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए भीड़ में आगे बढ़ते हैं, लेकिन शिव की साधना दिखावे से नहीं, एकांत भावना से जुड़ी मानी जाती है. काशी की परंपरा में जल के साथ बिल्वपत्र, धतूरा और अक्षत अर्पित करने की भी बात कही जाती है, पर सबसे ऊपर भाव को रखा गया है.
शिव नाराज़ होते हैं या नहीं?
यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि क्या सच में गलती करने पर शिव नाराज़ होते हैं? धार्मिक विद्वान मानते हैं कि शिव को भोलेनाथ यूं ही नहीं कहा जाता. वे भाव के भूखे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विधि की अनदेखी की जाए. सही जानकारी के साथ की गई पूजा मन में संतोष देती है और श्रद्धा को मजबूत करती है.
महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक करते समय यदि पात्र, दिशा, आसन और मंत्र-इन चार बातों का ध्यान रखा जाए, तो पूजा अधिक अर्थपूर्ण बन सकती है. आखिरकार, शिव को जल से ज्यादा भक्त का समर्पण प्रिय है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


