Pehla Surya Grahan: मानव इतिहास का पहला सूर्य ग्रहण… जब धरती पर चारोओर छा गया था अंधकार, त्रेतायुग और द्वापरयुग से है नाता

Pehla Surya Grahan: मानव इतिहास का पहला सूर्य ग्रहण… जब धरती पर चारोओर छा गया था अंधकार, त्रेतायुग और द्वापरयुग से है नाता

Pehla Surya Grahan: खगोलीय घटना में दिलचस्पी रखने वालों के लिए 21 सितंबर यानी रविवार का दिन बेहद खास होने वाला है. वजह… इस दिन साल 2025 का अंतिम सूर्य ग्रहण लगेगा. यह सूर्य ग्रहण रात में 10 बजकर 59 मिनट पर लगेगा और 22 सितंबर दिन सोमवार को तड़के 3:23 एएम पर समाप्त होगा. कुल मिलाकर इस बार का सूर्य ग्रहण लगभग साढ़े 4 घंटे तक रहेगा. हालांकि, यह सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा. इसलिए सूतक काल भी मान्य नहीं होगा. बता दें कि, इस साल कुल 4 ग्रहणों का साया था. इसमें 1 सूर्य ग्रहण और 2 चंद्र ग्रहण लग चुके हैं. अब अंतिम सूर्य ग्रहण 21 सितंबर को लगेगा.

बता दें कि, जब भी कोई ग्रहण लगता है तो तमाम तरह की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं. जैसे- ग्रहण के दौरान क्या करना चाहिए क्या नहीं? ग्रहण के दौरान सोना चाहिए या नहीं? ग्रहण में भोजन करना चाहिए या नहीं? और भी तमाम तरह के सवाल होते हैं. लेकिन, एक सवाल अकसर अनसुलझा रह जाता है और वो है कि मानव इतिहास का पहला सूर्य ग्रहण कब लगा? बेशक इसपर वैज्ञानिक दृष्टिकोण कुछ भी हो, लेकिन धार्मिक महत्व कुछ और ही कहता है. कई विद्वान सूर्य ग्रहण को त्रेतायुग से जोड़ते हैं तो कुछ द्वापर से. तो चलिए जानते हैं कि, आखिर इस सवाल पर असल धार्मिक पहलू क्या है?

सूर्य ग्रहण का त्रेता युग से संबंध

बात त्रेता युग की है कि, उस वक्त कुछ ऐसा हुआ कि लोगों को सूर्य ग्रहण का एहसास हुआ था. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, अंजनी पुत्र हनुमानजी बचपन में बहुत ही नटखट थे और बहुत उछल कूद करते थे. ऐसे में उन्हें भूख भी बहुत लगती थी. वे हर लाल-पीली चीज को देखकर फल समझते थे. एक दिन हनुमान जी को बहुत जोर से भूख लगी. इस पर उन्होंने मां से भोजन मांगा. काम में व्यस्तता के चलते मां बोलीं कि, बाहर जाकर कोई लाल फल होगा उसे खा लो. सुबह-सुबह का वक्त था, इसलिए सूर्य का रंग एकदम लाल था. मां के आदेशानुसार हनुमानजी बाहर निकले और सूर्य को लाल फल समझ कर खाने के लिए निकल पड़े.

उस दिन राहु सूर्य को ग्रहण लगाने वाले थे, राहु सूर्य को ग्रहण लगा पाते उससे पहले ही हनुमान जी ने सूर्य को अपने मुख में भर लिया, जिससे पूरा संसार अंधकारमय हो गया. इस पर राहु को कुछ समझ में नहीं आया. तब उसने ये घटना इंद्रदेव को बताई. इंद्र देव के आग्रह करने पर जब हनुमान जी ने सूर्यदेव को मुक्त नहीं किया, तो इंद्र ने अपने वज्र से हनुमान जी के मुख पर प्रहार किया. इसके बाद सूर्य निकल कर बाहर आए.

सूर्य ग्रहण का द्वापर युग से संबंध

मानव जीवन में पहली बार सूर्य ग्रहण कब लगा? इसका एक धार्मिक पहलू कहता है कि सूर्य ग्रहण की शुरुआत द्वापर युग में हुई थी. कहा जाता है कि, सूर्य ग्रहण का सहारा लेकर ही अर्जुन ने जयद्रथ का वध किया था. धार्मिक कथा के अनुसार, महाभारत में जिस दिन पांडव कौरवों से जुए में अपना राजपाट और द्रौपदी को हार गए थे, उस दिन सूर्य ग्रहण का दिन था. महाभारत में अर्जुन ने जयद्रथ का वध किया था. इसके पीछे वजह यह थी, कि जयद्रथ के कारण अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध चक्रव्यूह में हुआ था.

पुत्र की मौत का बदला लेने के लिए अर्जुन ने जयद्रथ का वध करना चाहते थे. जयद्रथ को बचाने के लिए कौरव सेना ने सुरक्षा घेरा बना लिया था और अर्जुन को जयद्रथ तक पहुंचने नहीं दिया. जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि सूर्य अस्त होने वाला है, तब उन्होंने अपनी माया से सूर्य ग्रहण कर दिया. जिस वजह से अंधेरा छा गया. सभी को लगा कि सूर्य अस्त हो गया है. ग्रहण लगते ही जयद्रथ सुरक्षा घेरे से बाहर निकलकर अर्जुन के सामने आ गया और बोला सूर्यास्त हो गया है अब अग्निसमाधि लो. कुछ समय बाद कृष्ण की लीला से सूर्य ग्रहण खत्म हो गया और सूर्य चमकने लगा. ग्रहण के खत्म होते ही अर्जुन ने जयद्रथ का वध कर दिया.

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