Shukra Pradosh Vrat 2025: शुभ योग में आज शुक्र प्रदोष व्रत, जानें महत्व, पूजा विधि, पूजन मुहूर्त और शिवजी की आरती
शुक्र प्रदोष व्रत का महत्व
शुक्रवार का संबंध शुक्र ग्रह और माता लक्ष्मी से है तथा प्रदोष काल भगवान शिव-पार्वती की आराधना का श्रेष्ठ समय माना जाता है. इसलिए यह व्रत धन, सौभाग्य, दांपत्य सुख और ग्रहदोष शांति के लिए विशेष फलदायी होता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और पारिवारिक सौभाग्य प्राप्त होता है और भगवान शिव व माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है. विशेष रूप से यह व्रत वैवाहिक जीवन की मधुरता और दाम्पत्य सुख के लिए बेहद फलदायी माना गया है.
शुक्र प्रदोष व्रत 2025
त्रयोदशी तिथि का आरंभ – 5 सितंबर, सुबह में 4 बजकर 9 मिनट से
त्रयोदशी तिथि समापन – 6 तारीख, मध्य रात्रि 3 बजकर 14 मिनट तक
शास्त्रों में विधान है कि त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में होने पर ही प्रदोष तिथि का व्रत किया जाता है, ऐसे में शुक्र प्रदोष व्रत 5 सितंबर दिन शुक्रवार को किया जाएगा.
शुक्र प्रदोष व्रत 2025 पूजन मुहूर्त
गोधूलि मुहूर्त : 06:39 पी एम से 07:01 पी एम
विजय मुहूर्त : 02:26 पी एम से 03:17 पी एम
अमृत काल : 01:16 पी एम से 02:52 पी एम
सर्वार्थ सिद्धि योग : 06:02 ए एम से 11:38 पी एम
रवि योग : 11:38 पी एम से, 06:02 ए एम, सितम्बर 06
संध्या/प्रदोष काल (सूर्यास्त से 1.5 घंटे बाद तक) – यही पूजा का विशेष समय है. प्रदोष तिथि की पूजा प्रदोष काल में ही की जाती है.

शुक्र प्रदोष व्रत 2025 शुभ योग
शुक्र प्रदोष व्रत पूजा विधि
– आज ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान ध्यान से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें.
– इसके बाद पास के शिवालय में जाकर शिवलिंग को गंगाजल से स्नान कराएं.
– अब शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, अक्षत, पुष्प और चंदन अर्पित करें.
– दीपक जलाकर शिवजी को धूप-दीप अर्पित करें.
– ॐ नमः शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र का जप करें
– शुक्रवार होने के कारण माता पार्वती की भी विशेष पूजा करें और उन्हें श्रृंगार का सामान अर्पित करें.
– माता लक्ष्मी और देवी पार्वती की पूजा करके सुहाग सामग्री (चूड़ी, सिंदूर, वस्त्र) अर्पित करें.
– प्रदोषकाल (सूर्यास्त के बाद का समय) में शिव-पार्वती की आरती करें.
– व्रत करने वाले भक्त दिनभर फलाहार करें और संध्या पूजा के बाद ही भोजन करें.
– अगले दिन प्रातः ब्राह्मण या कन्याओं को भोजन कराकर व्रत का पारण करें.

शिवजी की आरती ‘ॐ जय शिव ओंकारा’
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥


