Hartalika Teej 2025 Puja Time: 2 दिन बाद हरतालिका तीज का व्रत, जानें शुभ योग में पूजा का सही समय और विधि
हरतालिका तीज व्रत शुभ योग
हरतालिका तीज पर इस बार चार शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है. हरतालिका तीज पर रवि योग, शुभ योग, साध्य योग रहने वाला है. साथ ही इस दिन गुरु और चंद्रमा एक दूसरे से केंद्र भाव में रहने वाले हैं, जिससे गजकेसरी योग का भी निर्माण हो रहा है. इन शुभ योग में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना और सभी सुखों की प्राप्ति होती है और वैवाहिक जीवन अच्छा रहता है.
हरतालिका तीज व्रत का महत्व
हरतालिका तीज व्रत को पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए करती हैं. इस व्रत को कठिन व्रत में से एक माना जाता है क्योंकि यह व्रत निर्जला उपवास रखा जाता है. हरतालिका तीज को करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है क्योंकि करवाचौथ में चंद्रमा को देखकर व्रत को संपन्न किया जाता है, वही इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के बाद ही व्रत संपन्न किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत से जुड़ी मान्यता यह है कि हरतालिका तीज व्रत करने वाली महिलाएं पार्वतीजी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं.
पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर शुरू होगी और 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी. ऐसे में उदया तिथि यानी सूर्योदय की तिथि को मानते हुए व्रत 26 अगस्त दिन मंगलवार को रखा जाएगा. पूजा का शुभ समय सुबह 5 बजकर 56 मिनट से 8 बजकर 31 मिनट तक है.
हरतालिका तीज पूजा विधि
इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं, साफ कपड़े पहनती हैं और पूरे मन से व्रत का संकल्प लेती हैं. मिट्टी या रेत से भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्तियां बनाई जाती हैं और उन्हें लकड़ी की चौकी पर सजा कर स्थापित किया जाता है. फिर देवी-देवताओं की पूजा की जाती है. फूल, बेलपत्र, चंदन, धूप-दीप, मिठाई, फल और सोलह श्रृंगार की चीजों से भगवान को भोग लगाया जाता है. महिलाएं पारंपरिक मंत्रों का जाप करती हैं, हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनती हैं और आरती करती हैं. यह पूजा अक्सर प्रदोष काल में यानी शाम के समय की जाती है. कई स्थानों पर महिलाएं रातभर जागकर भजन-कीर्तन भी करती हैं.

हरतालिका तीज की कथा
हरतालिका तीज की कथा के अनुसार, जब माता पार्वती विवाह योग्य हुईं तो उनके पिता हिमालय ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया. लेकिन माता पार्वती का मन भगवान शिव में था. उन्होंने अपनी सखियों के साथ वन में जाकर तपस्या की और रेत से शिवलिंग बनाकर शिवजी की आराधना की. इस कठिन तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया. यही वह दिन था, जिसे हर साल तीज के रूप में मनाया जाता है. इसीलिए यह व्रत अखंड सौभाग्य और दांपत्य सुख की प्राप्ति के लिए किया जाता है.


