Halshashthi 2025: हलषष्ठी के दिन पसई चावल और भैंस के दूध का दही ही क्यों होता है खास, जानें धार्मिक मान्यता और परंपरा का राज

Halshashthi 2025: हलषष्ठी के दिन पसई चावल और भैंस के दूध का दही ही क्यों होता है खास, जानें धार्मिक मान्यता और परंपरा का राज

Halshashthi 2025: भादो माह के कृष्ण पक्ष की छठी तिथि का दिन हर साल महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है. इस दिन हलषष्ठी, हरछठ या कमरछठ का पर्व मनाया जाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्मोत्सव का प्रतीक है. इस मौके पर महिलाएं अपने पुत्रों की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं और पारंपरिक तरीके से पूजा करती हैं. खास बात यह है कि इस व्रत में पूजा-पाठ और भोजन में केवल कुछ ही विशेष चीजों का उपयोग होता है, जिसमें पसई चावल और भैंस के दूध का दही सबसे प्रमुख है. इन चीजों का चयन कोई साधारण बात नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यता और परंपरा छिपी है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है. हलषष्ठी पर इन चीजों के प्रयोग को लेकर कई कहानियां और मान्यताएं हैं, जिन्हें जानने के बाद आप भी इस परंपरा की गहराई को समझ पाएंगे. इस बारे में बता रहे हैं ज्योतिषाचार्य अंशुल त्रिपाठी.

हलषष्ठी का महत्व और नाम का कारण
हलषष्ठी का नाम भगवान बलराम के शस्त्र ‘हल’ से जुड़ा हुआ है. मान्यता के अनुसार, भादो माह के कृष्ण पक्ष की छठी तिथि को भगवान बलराम का जन्म हुआ था. बलराम को बलदाऊ भी कहा जाता है और उनका प्रमुख अस्त्र हल है. इसलिए इस दिन को ‘हलषष्ठी’ कहा जाता है. इस दिन का व्रत जन्माष्टमी के दो दिन पहले आता है और हालांकि इसमें जन्माष्टमी जैसी धूमधाम नहीं होती, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसका महत्व बेहद खास है. देश के कई राज्यों में महिलाएं इस व्रत को बड़े श्रद्धा भाव से करती हैं.

क्यों नहीं होता हल से उगाई गई चीजों का उपयोग
हलषष्ठी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस व्रत में किसी भी ऐसी वस्तु का प्रयोग नहीं किया जाता जिसे हल चलाकर, यानी खेत की जुताई के जरिए उगाया गया हो. इसका कारण यह है कि इस दिन भगवान बलराम की पूजा होती है और उनके अस्त्र हल का सम्मान करते हुए इस दिन हल से जुड़ी चीजों का त्याग किया जाता है. माना जाता है कि ऐसा करने से व्रत का पुण्य और भी बढ़ जाता है और संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.

पसई चावल का महत्व
हलषष्ठी पर जो चावल इस्तेमाल होता है, वह ‘पसई चावल’ होता है. यह चावल हल से खेत जोतकर नहीं बल्कि बिना जुताई के, प्राकृतिक तरीके से उगाया जाता है. यही वजह है कि यह इस व्रत के लिए पूरी तरह उपयुक्त माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि पसई चावल पवित्रता और सादगी का प्रतीक है और व्रत के नियमों के अनुसार पूरी तरह शुद्ध माना जाता है.

भैंस के दूध के दही का कारण
हलषष्ठी के व्रत में गाय के दूध की बजाय भैंस के दूध से बने दही का ही प्रयोग होता है. इसका कारण यह है कि पारंपरिक रूप से भैंस के दूध के उत्पादन में हल का कोई योगदान नहीं होता, जबकि गाय का पालन प्रायः खेतों और खेती-बाड़ी से जुड़ा रहता है. भैंस का दूध और उससे बना दही इस दिन शुद्ध और व्रत के नियमों के अनुसार माना जाता है.

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धार्मिक मान्यता और लाभ
मान्यता है कि हलषष्ठी का व्रत करने से संतान की सेहत, लंबी उम्र और खुशहाली बनी रहती है. यह व्रत विशेष रूप से माताओं के लिए संतान की रक्षा का पर्व है. इस दिन किए गए नियम, व्रत और पूजा का फल कई गुना बढ़कर मिलता है.

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