3 Claps In Shiv Temple: शिवलिंग के सामने 3 बार ताली क्यों बजाते हैं? जानें इसका रहस्यमयी कारण, क्या इसके बिना अधूरी है शिव पूजा

3 Claps In Shiv Temple: शिवलिंग के सामने 3 बार ताली क्यों बजाते हैं? जानें इसका रहस्यमयी कारण, क्या इसके बिना अधूरी है शिव पूजा

3 Claps In Shiv Temple: कभी आपने ध्यान दिया है कि शिव मंदिर में आरती के बाद या अभिषेक पूरा होने पर लोग तीन बार ताली जरूर बजाते हैं? यह बस एक परंपरा भर है या इसके पीछे कोई गहरी बात छिपी है? अक्सर हम मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं, जल चढ़ाते हैं और लौट आते हैं, लेकिन कई बार कुछ छोटे-छोटे काम ऐसे होते हैं, जिनका मतलब हमें पूरी तरह पता नहीं होता. तीन बार ताली बजाना भी उन्हीं में से एक है. दिलचस्प बात यह है कि इस परंपरा का जिक्र ग्रंथों से लेकर लोककथाओं तक में मिलता है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

आस्था की परंपरा: पहली, दूसरी और तीसरी ताली का मतलब
हिंदू मान्यता के अनुसार जब कोई भक्त भगवान शिव के मंदिर में प्रवेश करता है, तो वह सिर्फ एक दर्शक नहीं रहता, बल्कि खुद को उनकी शरण में समर्पित करता है. कहा जाता है कि तीन तालियां तीन अलग भावों को दर्शाती हैं.

पहली ताली: “मैं आपकी शरण में आया हूं”
पहली ताली अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रतीक मानी जाती है. जैसे किसी दरबार में पहुंचकर हम अपनी मौजूदगी जताते हैं, वैसे ही यह संकेत है कि “हे महादेव, मैं आपके सामने हूं.” यह एक तरह से आत्म-स्वीकार है कि अब मैं आपकी शरण में हूं.

दूसरी ताली: मन की बात कहना
दूसरी ताली उस समय बजाई जाती है जब भक्त अपनी इच्छा, अपनी परेशानी या अपनी कामना मन ही मन शिव जी से कहता है. किसी को नौकरी चाहिए, किसी को संतान का सुख, तो कोई बीमारी से राहत चाहता है. यह ताली उस निवेदन का प्रतीक है.

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तीसरी ताली: क्षमा और समर्पण
तीसरी ताली सबसे खास मानी जाती है. इसमें भक्त खुद को पूरी तरह भगवान को सौंप देता है. अगर पूजा में कोई कमी रह गई हो, मंत्र ठीक से न बोले गए हों या मन भटक गया हो, तो क्षमा मांगने का भाव इसी ताली से जुड़ा माना जाता है.

पौराणिक कथाओं में ताली का जिक्र
लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि भगवान राम ने लंका विजय से पहले समुद्र किनारे शिवलिंग बनाकर पूजा की थी और तीन बार ताली बजाई थी. इसी तरह रावण को भी शिव का बड़ा भक्त बताया गया है. कथाओं में आता है कि वह पूजा के समय तीन तालियां बजाकर अपनी उपस्थिति, प्रार्थना और समर्पण व्यक्त करता था. हालांकि ये प्रसंग आस्था पर आधारित हैं, लेकिन समाज में इनकी गहरी पकड़ है. लोग इन्हें प्रेरणा की तरह देखते हैं-कि जब बड़े-बड़े पात्रों ने ऐसा किया, तो हम क्यों न करें.

क्या कहता है विज्ञान?
अब सवाल उठता है कि क्या ताली बजाने का कोई वैज्ञानिक आधार भी है? कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि ताली बजाने से हाथों की नसों पर हल्का दबाव पड़ता है, जिससे रक्त संचार बेहतर होता है. सुबह पार्क में ‘लाफ्टर क्लब’ में लोग हंसने के साथ ताली भी बजाते हैं. इससे एकाग्रता बढ़ती है और मन हल्का महसूस करता है. ताली की आवाज एक तरह का सकारात्मक संकेत भी देती है. किसी कार्यक्रम में अच्छा प्रदर्शन हो तो लोग ताली बजाकर सराहना करते हैं. मंदिर में भी यह एक सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक बन जाती है. जब आरती के बाद सब मिलकर ताली बजाते हैं, तो एक सामूहिक ऊर्जा पैदा होती है जो माहौल को अलग ही रंग दे देती है.

आज के समय में इसका महत्व
आज के तेज भागते जीवन में लोग मंदिर सिर्फ धार्मिक वजह से ही नहीं, बल्कि मानसिक सुकून के लिए भी जाते हैं. ऐसे में तीन बार ताली बजाना एक छोटा-सा रिवाज होते हुए भी मन को स्थिर करने का तरीका बन जाता है. यह हमें याद दिलाता है कि हम कुछ पल के लिए रुकें, खुद को संभालें और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें. कई श्रद्धालु बताते हैं कि जब वे नियम से यह परंपरा निभाते हैं, तो उन्हें एक अलग आत्मविश्वास महसूस होता है. जैसे उन्होंने अपनी बात सीधे महादेव तक पहुंचा दी हो. यह विश्वास ही तो आस्था की असली ताकत है.

तीन बार ताली बजाना सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि भाव, विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का मेल है. चाहे आप इसे पौराणिक कथा से जोड़कर देखें या वैज्ञानिक नजर से, इसका मकसद मन को केंद्रित करना और खुद को समर्पित करना ही है. अगली बार जब आप शिव मंदिर जाएं, तो इन तीन तालियों के अर्थ को याद रखिएगा-शायद आपका अनुभव पहले से ज्यादा गहरा हो जाए.

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