12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम सोमनाथ मंदिर, स्कंद पुराण में है रोचक कथा, अद्भुत रहस्यों से भरा है इसका धार्मिक महत्व
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12 Jyotirlinga Somnath Temple: वर्ष 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले बड़े हमले के 1,000 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व आयोजित किया जा रहा है. विदेशी आक्रांताओं ने कई बार इस मंदिर को लूटा और नष्ट किया, लेकिन हर बार इसे बनाया गया. आइए जानते हैं सोमनाथ मंदिर का धार्मिक महत्व…
12 Jyotirlinga Somnath Temple: भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय पूरा होने जा रहा है. वर्ष 1026 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर हुए विदेशी हमले को जनवरी 2026 में पूरे 1000 वर्ष हो रहे हैं. इस ऐतिहासिक अवसर पर भारत सरकार की ओर से सोमनाथ स्वाभिमान पर्व आयोजित किया जा रहा है. इस पहल का स्थानीय ब्राह्मण समुदाय, तीर्थ पुरोहितों और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं ने खुले दिल से स्वागत किया है. सोमनाथ मंदिर का वर्णन स्कंद पुराण में मिलता है और यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना गया है. शास्त्रों, पुराणों और लोक परंपरा तीनों में इसका विशेष स्थान है.

श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र सोमनाथ मंदिर – सोमनाथ मंदिर का इतिहास केवल एक मंदिर का इतिहास नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की अटूट शक्ति और निरंतर पुनर्जन्म की कहानी है. इतिहास गवाह है कि कई बार यवन आक्रमणकारियों ने इस पवित्र स्थल को नष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन हर बार यह मंदिर पहले से अधिक भव्य रूप में खड़ा हुआ. यही कारण है कि आज भी सोमनाथ मंदिर दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है.

स्कंद पुराण में सोमनाथ मंदिर का वर्णन – स्कंद पुराण के अनुसार, प्रभास क्षेत्र का विशेष महत्व है. यह क्षेत्र उत्तर में 126 किलोमीटर, पूर्व में तुलसीश्याम तक 111 किलोमीटर, पश्चिम में माधवपुर और दक्षिण में समुद्र के दक्षिणी ध्रुव तक फैला हुआ माना जाता है. मान्यता है कि यही वह भूमि है जहां भगवान श्रीकृष्ण 56 करोड़ यदुवंशियों के साथ आए थे और यहीं देहोत्सर्ग किया था. दक्षिण दिशा को पितृलोक से जोड़े जाने के कारण इस स्थान को मोक्षस्थल भी कहा जाता है.
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चंद्रदेव ने की थी स्थापना – शिव पुराण में उल्लेख है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग स्वयंभू है, यह चंद्रमा के बढ़ने-घटने के साथ तेजस्वी होता है. यह शिवलिंग सृजन, विनाश और पुनर्जागरण का प्रतीक है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, दक्ष प्रजापति के श्राप से क्षय रोग (कोढ़) से पीड़ित होने के बाद चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में तपस्या की और एक शिवलिंग की स्थापना की. चंद्र देव की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने यहीं दर्शन दिए, जिससे उन्हे क्षय रोग से मुक्ति मिली और फिर से तेजस्वी हुए. चंद्रमा को सोम भी कहा जाता है इसलिए स्थापित शिवलिंग को सोमनाथ कहा गया. भक्त यहां आकर रोग मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा करते हैं.

सरदार पटेल ने लिया मंदिर पुनर्निर्माण का संकल्प – भारत की आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प देश के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिया था. वर्ष 1947 में उन्होंने समुद्र का जल हाथ में लेकर यह प्रण किया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाएगा. जनता के सहयोग और जन-धन से बना यह भव्य मंदिर आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. स्थानीय लोग गर्व से कहते हैं कि सोमनाथ दादा के दर पर जो रोता हुआ आता है, वह मुस्कुराता हुआ जाता है.

महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था जीर्णोद्धार – इतिहासकारों और पुराणों के अनुसार, सोमनाथ मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए. 6 जनवरी 1026 को मुहम्मद गजनवी द्वारा किए गए हमले को अंतिम बड़ा आक्रमण माना जाता है. इसके बाद छोटे-छोटे राजवाड़ों ने समय-समय पर मंदिर का पुनर्निर्माण किया, हालांकि वह फिर नष्ट हुआ. इतिहास में मूलराज सोलंकी और भीमदेव सोलंकी जैसे राजाओं के योगदान को विशेष रूप से याद किया जाता है. लगभग 135 वर्ष पहले महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने भी सोमनाथ में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था.

देवी-देवताओं का मिलता है उल्लेख – सोमपुरा ब्राह्मण पुरोहित जयवर्धन जानी ने बताया कि अलग-अलग इतिहासकारों और पुराणों में सोमनाथ पर हमलों की संख्या अलग-अलग बताई गई है. कहीं 7 बार, कहीं 11 बार और कहीं 17 बार. उन्होंने कहा कि मंदिर कभी लकड़ी से, कभी पत्थर से और कभी विभिन्न धातुओं से बनाया गया. मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण, राजा भीमदेव और यहां तक कि भगवान श्रीराम के योगदान का भी उल्लेख मिलता है. प्राचीन काल में मंदिर के पास इतनी संपत्ति थी कि उसकी कीमत अरबों में आंकी जाती थी और इसकी प्रसिद्धि भारत से बाहर पूरी दुनिया में फैली हुई थी.


