महाभारत के बाद श्रीकृष्ण ने खुद स्थापित की थी विष्णुप्रिया की प्रतिमा, रुक्मिणी ने यहीं रु
महाभारत के बाद श्रीकृष्ण ने खुद स्थापित की थी प्रतिमा, रुक्मिणी ने की थी पूजा
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Sankta Devi Mandir Lakhimpur: महाभारत काल के कई मंदिर देशभर में मौजूद हैं. आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी मूर्ति की स्थापना स्वयं श्रीकृष्ण ने की थी. साथ ही देवी रुक्मिणी ने यहीं पर माता लक्ष्मी की आराधना भी की थी. बताया जाता है कि मंदिर की मुख्य मूर्ति भूरे पत्थर की है, जिस पर चांदी का कवच चढ़ाया गया है. आइए जानते हैं माता लक्ष्मी के इस मंदिर के बारे में…
Sankta Devi Mandir Lakhimpur: धन, वैभव, सुख और शांति की देवी माता लक्ष्मी का देश भर में कई दिव्य मंदिर है, जहां दर्शन मात्र से भक्तों का कल्याण हो जाता है. ऐसा ही एक पावन मंदिर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी शहर में स्थित है. यहां माता लक्ष्मी को शहर की कुलदेवी माना जाता है. लोक मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं यहां माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की थी. रुक्मिणी ने इसी स्थान पर माता की आराधना की थी. प्राचीन नैमिषारण्य क्षेत्र में स्थित अति प्राचीन यह मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है. संकटा देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह धाम लखीमपुर खीरी की आध्यात्मिक पहचान है. संकटा देवी मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि महाभारत काल से जुड़ी गहरी आस्था और पौराणिक कथा का जीवंत प्रमाण है.
रुक्मिणी ने विधि-विधान से की पूजा-अर्चना
लोक मान्यता के अनुसार, महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण जब पशुपतिनाथ की यात्रा पर नेपाल जा रहे थे, तब रुक्मिणी ने यहां कुछ समय रुककर लक्ष्मी पूजन करने की इच्छा जताई. रुक्मिणी की इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण ने स्वयं यहां माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की और रुक्मिणी ने विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना की. तभी से यह जगह संकटा देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हो गई. प्राचीन समय में यह क्षेत्र नैमिषारण्य का हिस्सा था, जहां घने और सुंदर वन थे. रुक्मिणी को इस रमणीक स्थान पर रुकने का मन हुआ, जिसके बाद कृष्ण ने यहां महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर दी. संकटा देवी को महालक्ष्मी का रूप भी कहा जाता है.
लखीमपुर खीरी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान
संकटा देवी मंदिर ना केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि लखीमपुर खीरी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान भी है. आज भी दूर-दूर से भक्त यहां आकर मां संकटा देवी से कष्ट व संकट हरने की प्रार्थना करते हैं. माता लक्ष्मी की स्थापना के कारण ही इस शहर का नाम पहले लक्ष्मीपुर पड़ा, जो बाद में लखीमपुर हो गया. मंदिर शहर के रेलवे स्टेशन से मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित है. यहां का विशाल प्रांगण, भव्य गुंबद और चारों ओर हरे-भरे वृक्ष मंदिर को और अधिक आकर्षक बनाते हैं. मुख्य मूर्ति भूरे पत्थर की है, जिस पर चांदी का कवच चढ़ाया गया है. मूर्ति सिंहासन पर विराजमान है.
ऐसा है माता संकटा देवी का मंदिर
मंदिर का मुख्य द्वार पूरब दिशा की ओर है और दक्षिण में भी एक बड़ा द्वार बना हुआ है. परिसर में यज्ञ स्थल, प्रदक्षिणा पथ भी हैं. नवरात्र में बड़ी देवी प्रतिमा भी स्थापित की जाती है. गर्भगृह में माता के साथ ही मंदिर परिसर में श्रीराम भक्त पंचमुखी हनुमान और शिवलिंग भी विराजमान हैं, संकटा देवी मंदिर शहर के प्रमुख शक्ति पीठों में से एक है. यहां संकटा देवी, बंकटा देवी और शीतला देवी की शक्ति पीठें हैं, जिनमें संकटा देवी मुख्य हैं. मंदिर में मंगला आरती, फूलों से सजी भव्य श्रृंगार के साथ दूसरी आरती, मंदिर बंद होने से पहले आरती और रात में कपाट बंद होने से पहले की आरती की जाती है. मंदिर में आरती समिति और पुरोहितों द्वारा नियमित रूप से पूजा-अर्चना की जाती है.
नवरात्रि में होती है विशेष पूजा
चैत्र व वासंतिक दोनों नवरात्रों में यहां देवी जागरण आयोजित होते हैं. इसके अलावा, गुप्त नवरात्रि, शुक्रवार, मंगलवार व देवी के अन्य दिनों पर विशेष पूजन किए जाते हैं. बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दरबार में पूजा करने आते हैं. मंदिर के विशाल प्रांगण में विवाह, मुंडन, अन्नप्राशन और नामकरण जैसे संस्कार भी किए जाते हैं. साल में एक बार श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन भी होता है. मंदिर का जीर्णोद्धार समय-समय पर तत्कालीन महेवा राज्य के राजाओं द्वारा किया गया.
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पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें


