महाभारत: अश्वत्थामा ने चलाया नारायणास्त्र, जो क्लस्टर बम-मिसाइल से भी था घातक!
Powers of Narayanastra: इस समय ईरान और इजरायल-अमेरिका के युद्ध में एक से बढ़कर एक आधुनिक मिसाइलों, क्लस्टर बम, ड्रोन, बंकर बस्टर बम आदि का उपयोग हो रहा है. इनकी मारक क्षमता, सटीकता और होने वाली तबाही दुश्मन खेमे में खलबली मचा कर रख देता है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि द्वापर युग के समय महाभारत के युद्ध में कौरव और पांडव सेना की ओर से कई ऐसे दिव्यास्त्रों का प्रयोग हुआ था, जो आज के क्लस्टर बम और मिसाइल से कई गुना घातक थे. जब द्रोणाचार्य का वध हुआ तो उनका पुत्र अश्वत्थामा दुख और आक्रोश से पागल सा हो गया और पांडवों की सेना का सर्वनाश करने का संकल्प करके अगले दिन युद्ध के मैदान में आया. उसने अपने सबसे शक्तिशाली दिव्यास्त्र नारायणास्त्र का प्रयोग किया. उस समय का नारायणास्त्र आज के क्लस्टर बम-मिसाइल से कहीं ज्यादा घातक था, उसकी विशेषताएं एक से बढ़कर एक थीं. उस नारायणास्त्र के चलाते ही पांडवों की सेना में हाहाकार मच गया. उसकी विशेषता यह थी कि वह अजेय था. उसे एक बार चला दें तो दुश्मन का सर्वनाश करके आता था, फिर पांडव उस नारायणास्त्र के प्रभाव से कैसे बच गए?
द्रोणाचार्य वध से आहत अश्वत्थामा ने प्रकट किया नारायणास्त्र
महाभारत के द्रोण पर्व में नारायणास्त्र के प्रकट करने और उसे चलाने का वर्णन है. जब अश्वत्थामा को पता चला कि धृष्टद्युम्न ने उसके पिता द्रोणाचार्य की छल से हत्या कर दी है. यह सुनकर वह क्रोध से भर गया. उसने शपथ लिया कि वह सभी पांचालों का वध किए बिना जीवित नहीं रह सकता है.
अश्वत्थामा ने जल से आचमन करके दिव्य नारायणास्त्र को प्रकट किया था. (Photo: AI)
अश्वत्थामा ने कहा कि उसके और अर्जुन से बढ़कर दूसरा कोई अस्त्रों का जानकार नहीं है. आज जिस अस्त्र का प्रयोग करूंगा, उसे न अर्जुन जानते हैं, न श्रीकृष्ण, भीमसेन, नकुल, सहदेव और न ही युधिष्ठिर का उसका पता है. धृष्टद्युम्न, शिखंडी और सात्यकि भी उसके बारे में कुछ नहीं जानते. उसके बाद अश्वत्थामा ने जल से आचमन करके दिव्य नारायणास्त्र को प्रकट किया.
अश्वत्थामा को कैसे मिला था नारायणास्त्र?
अश्वत्थामा ने बताया कि उसके पिता द्रोण ने भगवान नारायण की वैदिक मंत्रों से स्तुति की. जिससे वे प्रसन्न हुए. उन्होंने प्रकट होकर पिता द्रोण से वर मांगने को कहा. तो उन्होंने सर्वोत्तम नारायणास्त्र की मांग की. तब भगवान नारायण ने नारायणास्त्र देते हुए कहा कि अब युद्ध में तुम्हारी बराबरी करने वाला कोई नहीं रहेगा. युद्ध में जब इसका उपयोग करोगे, तो संपूर्ण शस्त्रों के प्रहार को बारंबार नष्ट कर सकोगे और स्वयं भी तेज से प्रकाशित होते रहोगे. द्रोणाचार्य ने उस नारायणास्त्र को भगवान से ग्रहण किया. उन्होंने फिर अश्वत्थामा को वह नारायणास्त्र दे दिया.
क्लस्टर बम-मिसाइल से कई गुना घातक था नारायणास्त्र!
नारायणास्त्र आज के क्लस्टर बम और मिसाइल से कई गुना घातक था. (Photo: AI)
आज के समय में दुश्मन के क्षेत्र में जाए बगैर टारगेट को लॉक करके मिसाइल से हमला करते हैं. ये मिसाइलें पल भर में दुश्मन के ठिकानों को तबाह कर देती हैं. क्लस्टर बम को मिसाइल की मदद से छोड़ा जाता है. उसमें सैकड़ो छोटे-छोटे बम होते हैं, जो दुश्मन के ठिकानों पर जाकर हमला करते हैं. यह बड़े क्षेत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. इनकी तेज गति, सटीकता, प्रभाव, लक्ष्य को ट्रैक करके हमला करना, रडार को चकमा देने की क्षमता दुश्मनों को अचंभित कर देती हैं. इन तकनीक आधारित हथियारों ने पारंपरिक युद्ध की शैली को बदल दिया है.
नारायणास्त्र की विशेषताएं
- अश्वत्थामा ने जैसे ही नारायणास्त्र को प्रकट किया, उससे हजारों बाण एक साथ आकाश में प्रकट हो गए. उन बाणों के नोक भी जलने लगे. एक क्लस्टर बम में सैकड़ों छोटे बम होते हैं, लेकिन नारायणास्त्र से एक साथ हजारों बाण निकलते थे और वे कभी खत्म नहीं होते थे.
- नारायणास्त्र के आते ही जैसे दो घड़ी में सूर्य की किरणें पूरे संसार में फैल जाती हैं, वैसे ही नारायणास्त्र से निकल रहे बाण सभी दिशाओं, आकाश और पांडव सेना में बरसने लगे.
- नारायणास्त्र से ही ग्रह और नक्षत्रों के समान काले लोहे के चलते हुए गोले भी प्रकट होकर गिरने लगे.
- उस नारायणास्त्र से 4 या 2 पहिए वाली तोपें, बहुत सी गदाएं और चक्र प्रकट होकर गिरने लगे. यह देखकर पांडव, पांचाल और समस्त सेनाएं घबरा गईं.
- पांडवों के महारथ जैसे-जैसे युद्ध करते थे, वैसे-वैसे नारायणास्त्र का वेग बढ़ता जाता था. सैनिक उस दिव्यास्त्र से झुलस गए थे. नारायणास्त्र पूरी पांडव सेना को भस्म करने लगा.
- भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों से कहा कि जो कोई पूरे मन से इस नारायणास्त्र का सामना करेगा, वे रसातल में भी चला जाएं तो भी यह अस्त्र वहां जाकर उन सबका सर्वनाश कर देगा. उन सबको मार डालेगा.
- नारायणास्त्र के प्रयोग से पांडवों की सारी सेना हथियार डालकर अचेत हो गई थी. सूर्य में अग्नि और अग्नि में सूर्य समा गए हों, उस प्रकार से इस अस्त्र का तेज था.
- भगवान नारायण ने जब द्रोण को नारायणास्त्र दिया था तो कहा था कि इस अस्त्र का प्रयोग यूं ही नहीं करना है, क्योंकि यह अस्त्र शत्रु का वध किए बिना पीछे नहीं लौटता है.
- यह नहीं जाना जा सकता है कि नारायणास्त्र किसको नहीं मारेगा? जिसे मारा न जा सके, जो वध के अयोग्य हो या जिसे प्राणदंड न दिया जा सके, यह अस्त्र उसका भी यह वध कर सकता है. इस वजह से इसका ऐसे ही प्रयोग न करें.
नारायणास्त्र से कैसे बची पांडवों की जान?
भगवान श्रीकृष्ण ने नारायणास्त्र से बचाई पांडवों की जान. (Photo: AI)
भगवान नारायण ने स्वयं नारायणास्त्र को शांत करने का उपाय बताया था. जिस पर इसका उपयोग हुआ हो, वह युद्ध के मैदान में अपने रथ से उतर जाए, अपने अस्त्र और शस्त्र को रख दे, इससे अभय प्राप्ति की याचना करे और अपने शत्रु की शरण ले. तभी यह नारायणास्त्र शांत होगा.
यह बात भगवान श्रीकृष्ण को पता थी. नारायणास्त्र जब मौत का तांडव मचा रहा था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने भी पांडव सेना से ऐसा ही करने को कहा. उन्होंने पांडव सेना और उसके सभी महारथियों को रथ से उतार दिया. उनके अस्त्र-शस्त्र को जमीन पर रखने को कहा. फिर सभी ने दोनों हाथ जोड़कर उस नारायणास्त्र को नमस्कार किया. उसके बाद नारायणास्त्र स्वयं धीरे-धीरे शांत हो गया. इस प्रकार से पांडवों की नारायणास्त्र से जान बची.
अश्वत्थामा ने दोबारा क्यों नहीं चलाया नारायणास्त्र?
दुर्योधन ने अश्वत्थामा से कहा कि पांडव सेना फिर से लड़ने के लिए आ गई है. तुम एक बार फिर से नारायणास्त्र का प्रयोग करो. इस पर अश्वत्थामा ने कहा कि एक बार इस अस्त्र का प्रयोग करने के बाद न यह अस्त्र फिर लौटता है और न ही इसका दोबारा प्रयोग ही किया जा सकता है. यदि इसका दोबारा प्रयोग किया जाएगा तो यह अस्त्र चलाने वाले को ही खत्म कर देगा, इसमें कोई संदेह नहीं है. श्रीकृष्ण ने इस अस्त्र के निवारण का उपाय बता दिया, नहीं तो संपूर्ण पांडव सेना का वध हो गया होता.


