मणिकर्णिका घाट पर 'मसान की होली' को लेकर क्या है विवाद? आस्था और शास्त्र में से किसकी होगी
मणिकर्णिका घाट पर ‘मसान की होली’ को लेकर क्या है विवाद? जानें पूरी घटना
Last Updated:
Masaan Ki Holi 2026: फाल्गुन मास में जहां पूरा देश रंगों की होली की तैयारी करता है, वहीं काशी में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है जो आस्था, वैराग्य और जीवन-मृत्यु के दर्शन को एक साथ समेटे हुए है. बाबा विश्वनाथ की नगरी में स्थित मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली मसान की होली सदियों पुरानी परंपरा मानी जाती है. यह आयोजन होलिका दहन से पहले या उसके आसपास विशेष तिथि पर किया जाता है, जिसमें साधु-संत, अघोरी और स्थानीय लोग शामिल होते हैं. आइए जानते हैं मसान की होली को लेकर क्या है विवाद…
Masaan Holi Date 2026: भगवान शिव की नगरी काशी के मणिकर्णिका घाट पर खेले जाने वाली मसान की होली विवादों में घिर गई है. मसान की होली हर वर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मणिकर्णिका घाट पर खेली जाती है. खबरों की मानें तो मसान की होली को लेकर डोम राजा परिवार के वंशज विश्वनाथ चौधरी ने जिला प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा है. इस ज्ञापन में मसान की होली के आयोजन पर रोक लगाने की मांग की है. चौधरी का कहना है कि मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख से होली खेलने की परंपरा शास्त्रसम्मत नहीं है. बता दें कि 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी है और 28 फरवरी को मणिकर्णिका घाट पर ‘मसान की होली’ खेली जाएगी. आइए जानते हैं आखिर किस तरह शुरू हुई यह परंपरा…

डोम राजा परिवार के वंशज ने क्या कहा? – विश्वनाथ चौधरी ने ज्ञापन सौंपकर कहा है कि मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली मसान की होली का कोई स्पष्ट शास्त्रीय आधार नहीं है. पहले यह आयोजन मसाननाथ मंदिर तक सीमित था लेकिन अब इसका दायरा बढ़ गया है. इस आयोजन से श्मशान की गरिमा प्रभावित हो रही है. लोग इस आयोजन में शराब का सेवन, हुडदंग और शवदाह में बाधा उत्पन्न करते हैं. उन्होंने चेतावनी भी दी है अगर इस आयोजन को नहीं रोका गया तो वे महाश्मशान में दाह संस्कार रोकने को बाध्य होंगे. बता दें कि मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार की परंपरा सदियों से डोम समुदाय के हाथ में ही रही है.

कैसे शुरू हुई यह परंपरा? – मान्यताओं के आधार पर जब भगवान शिव माता पार्वती को विवाह के बाद काशी लेकर आए थे, तब उनके गण और नगरवासियों ने उत्सव की इच्छा जताई थी. भगवान शिव ने उनकी इच्छा को माना, तब नगरवासियों ने रंगों के साथ इस उत्सव को मनाया. इस उत्सव में देवी-देवता भी शामिल हुए थे. लेकिन इस उत्सव से शिव के अन्य भूत-प्रेत, यक्ष, गंधर्व आदि दूर रहे थे. यह बात भगवान शिव को अच्छी नहीं लगी थी क्योंकि शिवजी हर किसी के भगवान हैं. इसके बाद फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष के द्वादशी तिथि को शिवजी ने काशी में गणों के साथ भस्म की होली खेली थी. बताया जाता है कि तभी से काशी में चिता की राख से होली खेलने की परंपरा शुरू हुई थी, जो आज भी अनोखे अंदार में निभाई जाती है.
Add News18 as
Preferred Source on Google

काशी का मणिकर्णिका घाट – काशी का मणिकर्णिका घाट सबसे प्रसिद्ध घाट में से एक है, यहां 24 घंटे दाह संस्कार होते रहते हैं. मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने से आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है. ऐसी आस्था है कि स्वयं भगवान शिव इस भूमि पर विराजमान हैं और मृत आत्माओं को तारक मंत्र प्रदान करते हैं. इसी विश्वास के साथ मसान की होली की परंपरा जुड़ी हुई है. मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने से आत्मा जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां माता पार्वती की कान की बाली गिर गई थी इसलिए इस घाट को मणिकर्णिका घाट कहते हैं.

क्या कहना है आयोजकों का? – दूसरी ओर आयोजकों का कहना है कि संपूर्ण काशी स्वयं में महाश्मशान है, जहां मृत्यु को भी उत्सव और मोक्ष की दृष्टि से देखा जाता है. इस अवसर पर शिवजी भस्मांगरागाय महेश्वर के रूप में गणों के साथ चिता भस्म से फाग रचते हैं. दोपहर के समय घाट पर राग-रागिनियों के बीच चिताओं की राख से होली खेली जाती है. मसान की होली में साधु-संत, नागा, तांत्रिक और अघोरी परंपरा से जुड़े लोग इसमें शामिल होते हैं. मसान की होली यह संदेश देती है कि जीवन और मृत्यु एक ही चक्र के दो पहलू हैं. यहां रंगों की जगह चिता की राख का उपयोग किया जाता है, जो यह बताता है कि अंततः सब कुछ पंचतत्व में विलीन हो जाता है. मसान की होली की परंपरा वर्षों से चली आ रही है, इसको अचानक से रोकना सांस्कृतिक विरासत पर आघात होगा. विवाद को देखते हुए जिला प्रशासन सतर्क हो गया है और दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.


