मंदिरों में क्लॉकवाइज क्यों लगाते हैं परिक्रमा? सदगुरु से जानें गीले कपड़ों के साथ क्यों क
मंदिर में क्लॉकवाइज क्यों लगाते हैं परिक्रमा? गीले कपड़ों में परिक्रमा के लाभ
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धार्मिक आस्था के केंद्र मंदिरों में परिक्रमा करने की परंपरा एक बार फिर चर्चा में है. श्रद्धालु मानते हैं कि मंदिर में देवता की परिक्रमा करने से मन, शरीर और विचार शुद्ध होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है. परिक्रमा के दौरान भक्त भगवान के प्रति समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि मंदिरों में क्लॉकवाइज क्यों लगाते हैं परिक्रमा…
मंदिरों में घड़ी की सुई की दिशा में यानी क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा या परिक्रमा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसे सिर्फ धार्मिक रीति नहीं बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. मंदिर का गर्भगृह एक शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र होता है. मंदिर में क्लॉकवाइज परिक्रमा करना केवल रिवाज नहीं है बल्कि यह पृथ्वी की प्राकृतिक ऊर्जा दिशा के साथ तालमेल बिठाने का वैज्ञानिक तरीका है. सही तरीके से की गई परिक्रमा व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाती है. क्लॉकवाइज परिक्रमा करने से व्यक्ति को शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है. क्लॉकवाइज परिक्रमा करने से ब्रह्मांडीय ऊर्जा शरीर में आसानी से आत्मसात हो जाती है, जिससे मानसिक शांति, शारीरिक स्फूर्ति और आत्मिक विकास होता है.
क्लॉकवाइज परिक्रमा के पीछे वैज्ञानिक सिद्धांत
क्लॉकवाइज परिक्रमा के पीछे वैज्ञानिक सिद्धांत भी है. इस बारे में ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सदगुरु जगदीश वासुदेव भी इस विषय में विस्तार से जानकारी देते हैं. उत्तरी गोलार्ध में परिक्रमा घड़ी की सुई की दिशा में ही की जाती है क्योंकि यह पृथ्वी की प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह के अनुकूल है. उन्होंने उदाहरण दिया कि जब हम नल की टोंटी खोलते हैं तो पानी उत्तरी गोलार्ध में हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में घूमकर बाहर निकलता है. अगर हम दक्षिणी गोलार्ध में जाएं तो पानी उल्टी दिशा में घूमेगा. इसी तरह पूरा ऊर्जा तंत्र काम करता है. जब कोई शक्ति स्थान (मंदिर) हो, तो उसकी ऊर्जा को सही तरीके से ग्रहण करने के लिए क्लॉकवाइज परिक्रमा करनी चाहिए. सदगुरु बताते हैं कि इससे शरीर ऊर्जा को बेहतर तरीके से सोख पाता है.
इस तरह परिक्रमा करना ज्यादा फायदेमंद
धर्म शास्त्रों के अनुसार, परिक्रमा के दौरान अगर बाल गीले हों तो ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है. इससे भी बेहतर है कि पूरे कपड़े गीले हों. सबसे अधिक लाभ तब मिलता है जब व्यक्ति गीले कपड़ों में परिक्रमा करता है. गीले कपड़े शरीर को लंबे समय तक नम रखते हैं, जिससे ऊर्जा का अवशोषण बेहतर होता है. गीले कपड़ों में करना अधिक व्यावहारिक और बेहतर है क्योंकि शरीर जल्दी सूख जाता है.
पहले इस तरह की जाती थी मंदिर की प्रदक्षिणा
आप ध्यान दें तो हर मंदिर में एक जल कुंड या कुआं जरूर होता है, जिसे कल्याणजी भी कहा जाता है. परंपरा थी कि पहले कल्याणी में स्नान कर गीले कपड़ों में ही मंदिर की प्रदक्षिणा की जाती थी. इससे मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा को सबसे अच्छे तरीके से ग्रहण किया जा सकता था. आजकल ज्यादातर कल्याणी सूख चुकी हैं या गंदी हो गई हैं, जिसके कारण यह परंपरा कम हो गई है.
किस देवता की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए
मंदिरों में विभिन्न देवताओं की परिक्रमा संख्या भी अलग-अलग तय है. धर्मशास्त्र के अनुसार, गणेश जी की तीन बार, विष्णु जी की चार बार, देवी दुर्गा की एक बार और भगवान शिव की आधी परिक्रमा या जलधारी तक करने की परंपरा है. यह नियम ऊर्जा संतुलन और भक्ति के अनुसार बनाए गए हैं.
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पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें


