पृथ्वी पर यहां विश्राम करते हैं भगवान विष्णु, दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर लेकिन प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा की तरफ क्यों? जानें

पृथ्वी पर यहां विश्राम करते हैं भगवान विष्णु, दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर लेकिन प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा की तरफ क्यों? जानें

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Sri Ranganathaswamy Temple: भारत के दक्षिण भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनका इतिहास भारतीय संस्कृति को दर्शाता है. तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के पास श्रीहरि का एक ऐसा मंदिर है, जहां भगवान विष्णु विश्राम करते हैं इसलिए इस स्थान को भूलोक वैकुंठम का दर्जा प्राप्त है. यहां भगवान की प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा की तरह है. आइए जानते हैं भगवान श्री रंगनाथस्वामी जी के मंदिर के बारे में…

Sri Ranganathaswamy Temple: दक्षिण भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जो आस्था, अपनी परंपरा और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं. ऐसा ही भगवान विष्णु को समर्पित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर है, जहां हाथी के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है. इतना ही नहीं, मंदिर को यूनेस्को ने विशेष धरोहर का दर्जा दिया है, क्योंकि मंदिर की वास्तुकला और बनावट प्राचीन पद्धति की उत्कृष्ट कला-शैली को दिखाती हैं. मंदिर में 1000 स्तभों पर टिका बड़ा हॉल भी शामिल है. मान्यता है कि भगवान श्री रंगनाथस्वामी की पूजा आरती में शामिल होने से सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और हर पाप से मुक्ति मिलती है. यहां भगवान की प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा की तरफ है. आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में खास बातें…

108 वैष्णव दिव्य देशम में से एक – तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के पास भगवान विष्णु को समर्पित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर है, जो कि 108 वैष्णव दिव्य देशम में से एक है. माना जाता है कि 108 में से 105 दक्षिण भारत में स्थित हैं, जबकि 1 नेपाल और दिव्य लोक में स्थापित है. 108 वैष्णव दिव्य देशम की जानकारी तमिल ग्रंथों में भी मिलती है. ये मंदिर इतना खास है कि इसे ‘भूलोक वैकुंठम’ की उपाधि मिली है. भक्तों के बीच मान्यता है कि श्री रंगनाथस्वामी मंदिर धरती का वैकुंड है, जहां भगवान विष्णु विश्राम करते हैं.

प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा की तरफ – श्री रंगनाथस्वामी मंदिर में भगवान विष्णु की लेटे हुए प्रतिमा है. माना जाता है कि राक्षस को वश करने के बाद भगवान विष्णु ने यहीं आकर विश्राम किया था. प्रतिमा का मुंह दक्षिण दिशा की तरफ है. बताया जाता है कि प्रतिमा का मुख दक्षिण दिशा की तरफ इसलिए है क्योंकि भगवान रंगनाथ ने लंका जाने वाले विभिषण से वादा किया था, वे हमेशा मेरी नजरों के सामने रहेंगे और उनकी भूमि की रक्षा करेंगे, जो लंका है. इस वजह से भगवान रंगनाथ दक्षिण दिशा की ओर मुख करके विराजमान हैं, ताकि वे सीधे लंका की ओर देख सकें और विभीषण की रक्षा कर सकें.

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दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है यह – मंदिर अध्यात्म की दृष्टि से तो खास है ही, लेकिन इसके साथ ही मंदिर का बनाव और वास्तुकला इसे दूसरे मंदिरों से अलग बनाती है. यह मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है, जिसका गोपुरम भी सबसे बड़ा है. मंदिर का गोपुरम 13 स्तरों वाला 236 फीट ऊंचा है, जिस पर हिंदू देवी-देवताओं की छवि को अंकित किया गया है. मंदिर बाहर से जितना रंगीन है, अंदर से उतना ही प्राचीन है. मंदिर अंदर से काले पत्थर से बना है और स्तंभों पर गहराई से भगवान विष्णु, हाथी, और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को बनाया गया है.

मंदिर का अस्तित्व दूसरी शताब्दी से – मंदिर का अस्तित्व दूसरी शताब्दी से माना जाता है, लेकिन पुरातात्विक शिलालेख में दसवीं शताब्दी से मंदिर के निर्माण को जोड़ा गया है. मंदिर में चोल, चेर, पांड्य, होयसला, विजयनगर राजाओं और मदुरै के नायक के शासनकाल के दौरान कई परिवर्तन हुए थे. मंदिर पर अलग-अलग शासनकाल और शिल्प शैली का असर साफ देखने को मिलता है.

1000 स्तभों पर टिका बड़ा हॉल – मंदिर में 7 बड़े परिसर हैं, जो इसे भव्य बनाते हैं. साथ ही मंदिर परिसर में 21 बेहद रंगीन नक्काशीदार गोपुरम, 50 उप-मंदिर, 9 पवित्र कुंड और मुख्य देवता के गर्भगृह के ऊपर एक स्वर्णिम गुंबद भी बना है. इसके अलावा, मंदिर में 1000 स्तभों पर टिका बड़ा हॉल भी शामिल है. हॉल के अंदर देवी-देवताओं की रंगीन प्रतिमाएं बनी हैं. बताया जाता है कि हॉल का निर्माण विजयनगर काल में हुआ था.

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