चैत्र नवरात्रि का पहला दिन आज: पाना है माता शैलपुत्री का आशीर्वाद तो ऐसे करें पूजा

चैत्र नवरात्रि का पहला दिन आज: पाना है माता शैलपुत्री का आशीर्वाद तो ऐसे करें पूजा

Shailputri Puja Vidhi: नवरात्रि का समय आते ही घरों में एक अलग सी ऊर्जा महसूस होने लगती है दीयों की रोशनी, मंत्रों की ध्वनि और मन में एक नई शुरुआत का एहसास. 19 मार्च से शुरू हो रहे इस पावन पर्व का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस पूजा का सीधा संबंध आपके ग्रहों और कुंडली से भी होता है? ज्योतिष के अनुसार, नवरात्रि केवल भक्ति का पर्व नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और ग्रह संतुलन का सुनहरा अवसर भी है. खासकर मां शैलपुत्री की आराधना चंद्रमा को मजबूत करने और मानसिक स्थिरता पाने का सबसे प्रभावी तरीका मानी जाती है.

मां शैलपुत्री: नवदुर्गा का पहला और शक्तिशाली स्वरूप
नवदुर्गा के नौ रूपों में मां शैलपुत्री का स्थान सबसे पहले आता है. पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है. यह वही देवी हैं जो पिछले जन्म में सती थीं और जिन्होंने अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए यज्ञ अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया था.

पौराणिक कथा और उसका ज्योतिषीय संकेत
कथा के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपमानित होने के बाद सती ने आत्मदाह किया और पुनर्जन्म लेकर पार्वती के रूप में प्रकट हुईं. ज्योतिष की भाषा में देखें तो यह घटना “आत्म परिवर्तन” और “नई ऊर्जा के जन्म” का प्रतीक है. यह संकेत देता है कि जीवन में जब भी नकारात्मकता चरम पर हो, तब एक नई शुरुआत संभव होती है.

चंद्रमा का प्रभाव: क्यों खास है पहला नवरात्रि?
ज्योतिष शास्त्र में मां शैलपुत्री का संबंध चंद्र ग्रह से जोड़ा गया है. चंद्रमा मन, भावनाओं और मानसिक स्थिति का कारक होता है.

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यदि आपकी कुंडली में चंद्रमा कमजोर है, तो अक्सर मन अशांत रहता है, निर्णय लेने में कठिनाई होती है और जीवन में स्थिरता की कमी महसूस होती है. ऐसे में मां शैलपुत्री की पूजा बेहद लाभकारी मानी जाती है.

मूलाधार चक्र और साधना की शुरुआत
पहले नवरात्रि में साधक अपने ध्यान को मूलाधार चक्र पर केंद्रित करते हैं. यही वह बिंदु है जहां से आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है. आसान भाषा में कहें तो यह आपके जीवन की “नींव” को मजबूत करने जैसा है जितनी मजबूत नींव, उतनी स्थिर जिंदगी.

सरल चरणों में पूजा विधि
-मां शैलपुत्री की पूजा में बहुत कठिन नियम नहीं हैं, लेकिन शुद्धता और सच्ची भावना जरूरी है.
-सबसे पहले लकड़ी की चौकी पर लाल या सफेद वस्त्र बिछाकर माता की प्रतिमा स्थापित करें.
-इसके बाद घी का दीपक जलाएं और माता को स्नान कराएं.
-सफेद फूल और वस्त्र अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है.
-पूजा के दौरान सभी सामग्री जैसे फल, मिठाई, खीर, पंचामृत एक-एक करके अर्पित करें.
-खासतौर पर मखाने की खीर और गाय के घी से बनी मिठाई माता को अत्यंत प्रिय मानी जाती है.
-यह सिर्फ भोग नहीं, बल्कि चंद्रमा को संतुलित करने का उपाय भी है.

विशेष मंत्र और उनका प्रभाव
“ॐ शं शैलपुत्री दैव्यै नमः” मंत्र का जाप मानसिक शांति और आत्मविश्वास बढ़ाता है.

वहीं या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।। मंत्र का उच्चारण वातावरण को सकारात्मक बनाता है.

ज्योतिषीय दृष्टि से, मंत्रों का कंपन आपके आसपास की ऊर्जा को प्रभावित करता है. कई साधकों का अनुभव है कि नियमित जाप से जीवन में नकारात्मकता कम होती है.

मां दुर्गा की स्थापना के लिए जरूरी वस्तुएं
पूजा की शुरुआत मां दुर्गा की तस्वीर या कैलेंडर से होती है. इसके साथ एक साफ-सुथरी चौकी पर माता की स्थापना की जाती है. श्रृंगार की सामग्री जैसे लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी और इत्र न केवल परंपरा का हिस्सा हैं, बल्कि ये सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी मानी जाती हैं.

मिट्टी का बर्तन और जौ बोना विशेष महत्व रखता है, जिसे जीवन में समृद्धि का संकेत माना जाता है. तांबे या मिट्टी का कलश, आम के पत्ते और नारियल. रोली, कुमकुम और अक्षत जैसे तत्व पूजा में स्थिरता और शुभता का संकेत देते हैं. वहीं फूल-माला, अगरबत्ती, धूप और दीपक वातावरण को शुद्ध करते हैं. पान, सुपारी, लौंग-इलायची और मिठाई का भोग भी देवी को अर्पित किया जाता है.

घटस्थापना का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, 19 मार्च को घटस्थापना का शुभ समय सुबह 6:52 से 7:53 तक रहेगा. यह समय इसलिए खास है क्योंकि इस दौरान ग्रहों की स्थिति संतुलित और सकारात्मक रहती है.

अगर किसी कारणवश इस समय पूजा संभव न हो, तो दोपहर का अभिजीत मुहूर्त भी एक अच्छा विकल्प है. यह मुहूर्त 12:05 से 12:53 तक रहेगा. ज्योतिष में इसे “सर्वश्रेष्ठ समय” माना जाता है, जब किए गए कार्यों में सफलता की संभावना बढ़ जाती है.

भोग और प्रसाद: क्यों है खास महत्व
माता शैलपुत्री को सफेद वस्तुएं विशेष प्रिय होती हैं. गाय के घी से बनी मिठाई और मखाने की खीर चंद्रमा को मजबूत करती है. इसके अलावा, कुंवारी कन्याओं को प्रसाद देना भी शुभ माना जाता है, जिससे घर में सुख-समृद्धि आती है.

जीवन पर असर: क्यों जरूरी है यह पूजा?
आज के दौर में जहां हर कोई तनाव, अस्थिरता और चिंता से जूझ रहा है, वहां यह पूजा एक मानसिक एंकर की तरह काम करती है.

नवरात्रि का पहला दिन केवल पूजा नहीं, बल्कि खुद को रीसेट करने का मौका है. मां शैलपुत्री की आराधना से न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी जीवन में संतुलन आता है.

मां शैलपुत्री की आरती

शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।।

शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।।

पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।।

ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।।

सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।।

उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।।

घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।।

श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।।

जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।।

मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।।

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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