काशी में इन 5 लोगों की नहीं जलाई जाती लाश, गरुड़ पुराण के नियम होते हैं लागू

काशी में इन 5 लोगों की नहीं जलाई जाती लाश, गरुड़ पुराण के नियम होते हैं लागू

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काशी को विद्याओं की राजधानी कहा गया है, यहां अनेक ऋषियों, आचार्यों ने वेद-शास्त्र, ज्योतिष व तंत्र साधना की परंपरा को आगे बढ़ाया. यहां से मिली जानकारी के अनुसार, काशी में 5 लोगों की लाश कभी नहीं जलाई जाती है. आ…और पढ़ें

काशी में इन 5 लोगों की नहीं जलाई जाती लाश, गरुड़ पुराण के नियम होते हैं लागू
स्कंदपुराण, काशीखण्ड में कहा गया है कि काशी स्वयं भगवान शिव का निवास है और यहां मृत्यु होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है. गंगा जी के तट पर स्थित काशी को अनादि और अविनाशी कहा गया है. स्वयं भगवान शिव ने कहा है कि प्रलय के समय भी काशी का विनाश नहीं होता. मुक्ति और मोक्ष की नगरी काशी में अगर जिंदगी के आखिरी समय गुजरते हैं तो उस पर स्वयं देवों देव महादेव कृपा करते हैं. काशी में कई ऐसे श्मशान घाट हैं, जहां 24 घंटे किसी ना किसी का दाह संस्कार हो रहा होता है. लेकिन बहुत से कम लोगों को जानकारी है कि काशी में भी 5 लोगों की काश कभी नहीं जलाई जाती. जी हां! यह बिल्कुल सच है. आइए जानते हैं काशी में किन लोगों की लाश नहीं जलाई जाती.

साधु संत का शव
गरुण पुराण के अनुसार, साधु संत का कभी दाह संस्कार नहीं किया जाता है. साधु संत की बॉडी को या तो जल समाधी दी जाती है या फिर थल समाधी. ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि वे पहले ही गृहस्थ आश्रम और सभी सांसारिक सुखों का त्याग कर चुके होते हैं. ये अपनी तपस्या के माध्यम से इंद्रियों पर काबू पा चुके होते हैं इसलिए साधु संतों को जल या थल समाधी दी जाती है.

11 साल के कम उम्र का बच्चा
काशी में कभी भी छोटे बच्चों की बॉडी को नहीं जलाया जाता क्योंकि यहां भी गरुड़ पुराण का नियम लागू होता है. गरुड़ पुराण के अनुसार, अगर बच्चा गर्भ में पल रहा है या फिर 11 साल से कम उम्र के बच्चे की अगर मृत्यु हो जाती है तो उसकी बॉडी को जलाया नहीं जाता. ऐसे बच्चों को थल समाधी दी जाती है. जनेऊ संस्कार होने के बाद ही बॉडी को जलाया जाता है. वहीं लड़की के अगर मासिक धर्म शुरू नहीं हुए हैं तो उनको भी थल समाधी दी जाती है.

सर्पदंश वाले व्यक्ति की
जिस इंसान की मौत सर्पदंश यानी सांप के काटने से हुई है, उसको काशी में कभी नहीं जलाया जाता है. गरुड़ पुराण के अनुसार, सांप के काटने से या फिर जहर से किसी की मृत्यु हुई हो तो उनकी भी बॉडी नहीं जलाई जाती है. मान्यता है कि ऐसे व्यक्ति के शरीर में 21 दिन तक सूक्ष्म प्राण रहते हैं अर्थात वह पूरी तरह से मुत्यु को प्राप्त नहीं हुआ होता है इसलिए ऐसे लोगों को थल समाधी देने की परंपरा है.

प्रेगनेंट महिला का नहीं जलाया जाता शव
गरुड़ पुराण के अनुसार, कभी भी प्रेग्नेंट लेडी की बॉडी को नहीं जलाया जाता. प्रेग्नेंट महिला को जब जलाया जाता है तब उसका पेट फूला होता है. चिता की आग से पेट फटने की संभावना रहती है, जिससे भ्रूण के बाहर आने खतरा बना रहता है, जो देखने में अच्छा नहीं लगता. इसलिए काशी में प्रेग्नेंट महिला का शव नहीं जलाया जाता. इसलिए प्रेग्नेंट महिला को जल या थल समाधी दी जाती है.

संक्रमित रोग से मृत व्यक्ति
कुष्ट या चर्म रोग से पीड़ित व्यक्ति की अगर मृत्यु होने पर उसकी बॉडी को भी काशी में नहीं जलाया जाता. गरुड़ पुराण के अनुसार, ऐसे लोगों को थल समाधी देने का विधान है. संक्रमित रोग से पीड़ित व्यक्ति की बॉडी को जलाने पर हवा में बैक्टीरिया फैलने का खतरा बना रहता है, जिससे अन्य लोगों पर भी संक्रमित होने का खतरा बना रहता है. इसलिए काशी में ऐसे लोगों की बॉडी जलाने पर बैन है.

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Parag Sharma

मैं धार्मिक विषय, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष उपाय पर 8 साल से भी अधिक समय से काम कर रहा हूं। वेद पुराण, वैदिक ज्योतिष, मेदनी ज्योतिष, राशिफल, टैरो और आर्थिक करियर राशिफल पर गहराई से अध्ययन किया है और अपने ज्ञान से प…और पढ़ें

मैं धार्मिक विषय, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष उपाय पर 8 साल से भी अधिक समय से काम कर रहा हूं। वेद पुराण, वैदिक ज्योतिष, मेदनी ज्योतिष, राशिफल, टैरो और आर्थिक करियर राशिफल पर गहराई से अध्ययन किया है और अपने ज्ञान से प… और पढ़ें

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